Friday, 2 August 2013

From the timeline of fb...

काश ग़ालिब ने सुनी होती शाहिर की ग़ज़ल
तो वो कहते मुकरर- मुकरर,

काश मजनू ने गाई होती शाहिर की ग़ज़ल,
तो शायद दुनिया वाले लैला को उससे न छिनते...
Abhijit Bhattacharya
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10+2 हिंदी की पाठ्यपुस्तक में एक खुबसूरत गीत पढने को मिला...(शाहिर लुधियानवी ) 

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है...
जिस इल्म ने इंसान को तक़सीम किया है,
उस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है...

तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया...
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें, एक ही धरती,
हमने कहीं भारत, कहीं ईरान बनाया...

जो तोड़ दे हर बंध, वो तूफान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

नफरत जो सिखाए, वो धरम तेरा नहीं है,
इंसां को जो रौंदे, वो कदम तेरा नहीं है...
कुरआन न हो जिसमें, वो मंदिर नहीं तेरा,
गीता न हो जिसमें, वो हरम तेरा नहीं है...

तू अम्न का और सुलह का अरमान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

ये दीन के ताजिर, ये वतन बेचने वाले,
इंसानों की लाशों के कफन बेचने वाले...
ये महल में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे,
कांटों के इवज रूह-ए-चमन बेचने वाले...

तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

फिल्म : धूल का फूल
गीतकार : साहिर लुधियानवी
संगीतकार : एन दत्ता
पार्श्वगायक : मोहम्मद रफी
फिल्म निर्देशक : यश चोपड़ा (यह इनकी निर्देशक के रूप में पहली फिल्म थी)
फिल्म निर्माता : बीआर चोपड़ा

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लड़कियां एवेरेस्ट की छोटी पर तिरंगा फहराती है,
और बस/ट्रेन में दूसरों से शीट की आशा भी रखती है ।

If a girl deserve seat on the merit of being a girl,then she deserve to be second class.

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ऐ खुदा...
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तेरी माँ चुदा...

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इतनी शक्ति हमें देना दाता...

स्कूलों में सुबह-सुबह मोहताज़ बनाना सिखाया जाता है जबकि शिक्षा का उद्देश्य खुदगर्ज बनाना है।
अब इन्हें कौन बताये शक्ति दाता के पास नही, हमारे अंदर है।

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एकमात्र लड़का जिससे वो मिलती है, वो है ऑटो ड्राईवर जो उसे स्कूल छोड़ने जाता है और एक दिन पता चलता है वो उस ड्राईवर के साथ भाग गई । 

जो पेरेंट्स अपनी लड़की पर बाहर जाने की, बोलने-बतियाने की बंदिशे लगते है, उन्हें ये नही पता वो अपनी लड़की में एक complex पैदा कर रहें है जो उनके मानसिक विकास को अवरुद्ध करता है ।
— feeling sad.

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स्कूल में 3rd -4th क्लास से ही लड़के-लड़की को अलग-अलग डेस्क पर बैठना शुरू । लड़की को घर तक सीमित रखना, लड़कों से मिलने-जुलने नही देना: 

ये बंदिशें लड़की और लड़कों में एक complex पैदा करती है, जिसके कारण उनके बीच कभी भी सहज-स्वभाविक रिश्ता और प्यार नही हो सकता । भारतीय समाज में लड़का-लड़की के बीच प्यार न तो आज तक कभी घटित हुआ है और न ही हो सकता है ।

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मेरा छोटा सा सन्देश है !
आनंद से जियो !!

और जीवन के समस्त रंगों को जियो !
सारे स्वरों को जियो !!

कुछ भी निषेध नही करना है !
जो भी परमात्मा का है, शुभ है !!

जो भी उसने दिया है अर्थपूर्ण है !
-ओशो

भारत का व्यवधान:- उद्देशिका

स्कूल में पढ़ाने के लिए जब भी किताब खोलता हूँ तो सबसे पहले संविधान की उद्देशिका सामने होती है जो मेरे हिसाब से इस प्रकार होनी चाहिए

 " हम भारत के मिडिल क्लास लोग , भारत को एक सम्पूर्ण चूतियों से सम्पन्न, पुरुषवादी, हिन्दुसापेक्ष, खापतंत्रात्मक लंडराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त पुरुष नागरिकों को :
           
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, सेक्स, गालिगलोच, शक, बलात्कार और छेड़छाड़ की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
             
उन सबमें महिलायों की गरिमा को चोदने और पित्रसत्ता की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए, हम सब आट्टा चोदने की मशीन रूपी भारतीय, अपने दिमाग को गांड में रखते हुए,
               
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस व्यवधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

Monday, 18 March 2013

Some of my facebook posts

Facebook authority deleted my so called controversial posts. So from now i am having the back up of same.

ड्राइविंग करने की उम्र 18 साल तो सेक्स की 16 साल क्यों ?
कितनी मूर्खतापूर्ण तुलना है ये ।
ड्राइविंग में हमारी गलती से दूसरों की गांड फट सकती है, लंड कट सकता है,लेकिन आपके पड़ोस में अगर 16 साल के लड़का-लड़की सेक्स कर रहें है तो अपनी गांड बिलकुल नही फटेगी, इसकी फुल गारंटी में लेता हूँ । इसलिए इसका विरोध करने की आवश्कता नही है क्योंकि ये एक निहायत ही व्यक्तिगत मामला है और एक नेसर्गिक चीज है । 

अगर भगवान ने हमें 16 की उम्र में सेक्स करने के लिए capable बनाया है तो इसका विरोध करना, भगवान का विरोध करने के सामान है ।

अपर्लिखित तुलना दैनिक जागरण के सम्पादकीय में की गई है । 
जिस देश में सम्पादकीय लेख भी लोकप्रिय धारणायों के आधार पर लिखे जाते है, उस देश में चुतिया लोग हमेशा चूत का विरोध करते रहेंगे ।

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योन के प्रति हमारा जो attitude है वो इतना सड़ा हुआ है कि इसे बदलने की जरुरत है ।
कुछ दोस्तों को मेरा इस विषय पर लिखना नागवार गुजरता है और वो नाक-भों सिकोड़कर कहते है-
"कुछ चीजें उजागर करने की नही, सिर्फ परदे के पीछे करने की होती है ।"
ऐसा क्यों? पूछने पर वो ऐसा face बनाते है जैसे वो बहुत बड़े पंडित है और मैंने उनसे कोई मूर्खतापूर्ण प्रश् पूछ लिया हो । 
They are orthodox bitch.

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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अरूण पूरी के पूछने पर मोदी ने कहा हमारी(भारत की) सबसे बड़ी समस्या हमारा mindset है, सबसे बड़ी समस्या हम खुद हैं । काश अरूण प्रतिप्रश्न करते कि mindset कैसे बदला जाये । प्रभु चावला होते तो ये जरुर पूछते क्योंकि ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है ।
121 करोड़ लोगों का mindset बदलना असंभव है, इसलिए PM चाहे भगवान को बना दो, देश नही बदलने वाला । 
I think Mr Modi can make just a little difference.

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भगवान की मूर्ति द्वारा दूध पीने, आंसू आने की अफवाहें तो काफी सुनी हैं ।
काश किसी दिन मंदिर में शिवलिंग और पार्वती योनि की कामक्रीड़ा की अफवाह भी सुनाने को मिले 

या शिवलिंग हस्तमेथुन हुए पकडे जाएँ और निशान्तान दपंती उसके वीर्य का तिलक लगाकर पुत्र की कामना करें ।

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हमारा बछड़ा(Calf) अपनी माँ (गांय )के साथ सेक्स करने की कई असफल कोशिशे कर चूका है ।
अगर स्वतंत्र सोच का नाम आधुनिकता है तो हमारा बछड़ा किसी भी इन्सान से ज्यादा आधुनिक है ।

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मैं पूनम पाण्डेय, सन्नी लियॉन जैसी बहादुर महिलायों की भी उतनी ही इज्जत करता हूँ जीतनी मदर टरेसा या लक्ष्मी बाई की ।

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शिक्षित होने बावजूद स्त्रियाँ समर्पण और सुरक्षा की खोज में रहती हैं । वे आज़ादी को महत्व नही देती । 

- किरण बेदी ( किताब- गलती किसकी...)

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As a man get older, his sex instincts travel from his middle to his head.

A very first sentence in novel "The Company of Women" by Khushawant Singh.

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हम अपनी आय का कितना % साहित्यिक किताबों पर खर्च करते हैं ?
जिसका ये % जितना ज्यादा होगा, वो उतना ही ज्यादा समझदार होगा ।
शायद ये समझदारी का पैमाना हो सकता है ।

और मंदिर में दान, प्रसाद आदि के खर्च को मुर्खता का पैमाना माना जा सकता है ।

यदि ये खर्च 360 रूपये /वार्षिक {12x30(10प्रसाद +10दान +10पेट्रोल)}माना जाये और इन पैसों से एक किताब खरीदी जाये तो इस प्रकार हम दस साल में 10 किताबें खरीद सकते हैं । और 10 किताबें किसी की भी जिंदगी बदलने के लिए काफी हैं । फिर हमें किसी भगवान की आवश्कता नही होगी और न ही देश को बदलने के लिए किसी मोदी/राहुल की तरफ देखना पड़ेगा ।

यदि हम ऐसा करते हैं तो दस साल में देश बदल सकता है और नही करते तो देश का प्रधानमंत्री चाहे भगवान को बना दें, कुछ नही बदलने वाला ।

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"Man fuck the woman."
इस वाक्य में man subject (कर्ता) है और woman object. और इसी बात पर तो ऐतराज है की women object नही हैं । 
Fucking is a mutual act (intercourse) in which both man and women are subject.
भाषाओँ ने भी महिलायों के साथ अन्याय किया है।

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अगर तलाक का केस हो तो हमारा कानून पति से पत्नी को मुवावजा दिलवाता है ।पत्नी यदि अपने पैरों पर नही है तो असमें पति का क्या दोष, पति उसका जीवन साथी है, न कि उसका पालनहार। तो पति मुवावजा क्यों देगा??

उसके पालनहार उसके पेरेंट्स हैं जो उसकों सम्पति में उसका हक नही देते और न ही उसे पड़ा लिखा कर इस लायक बनाते हैं कि वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो । वो सिर्फ उसको पराया धन समझते हैं । पेरेंट्स से उसको उसका हक दिलवाना चाहिए, न कि पति से मुवावजा |

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जीवन का आखिरी उदेश्य आनंद प्राप्त करना है और ये बात जानवर हमसे बेहतर ढंग से समझते हैं ।

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हम जैसे-जैसे अध्ययन करते जाते हैं , वैसे-वैसे हमें अपनी मुर्खता का आभास होता जाता है ।

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मंदिरों की भीड़ और पुस्तकालयों का सूनापन ही भारत की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है ।

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मीडिया का सबसे प्रिय शब्द है- 'आम आदमी' 
और आम आदमी का प्रिय शब्द- 'टाइम पास' ।

मीडिया के लिया आम आदमी TRP है,
आम आदमी के लिए मीडिया टाइम पास है ।

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केला खाकर छिलका पडोसी के घर के सामने फेंकने वालों के इस देश में अस्वच्छता के लिया सरकार को दोष देना इस बात का परिचायक है कि यदि हम सड़क किनारे टट्टी करते है तो इसकी दोषी सरकार है और मीडिया अपने पाठकों से सच बोलने से डरता है क्योंकि ये इनके सरकुलेशन और TRP का सवाल है | यह शर्म का विषय है

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भारत में मंदिर बहुत पैसा कमा रहे हैं | हमे भगवान को एक्सपोर्ट करना चाहिए और विदेशों में भी ब्रांच खोलनी चाहिए |

Friday, 4 January 2013

बच्चे पैदा करने के लिए लाइसेंस लेना जरुरी कर देना चाहिए...


जिस प्रकार ड्राइविंग लाइसेंस देने से पहले ये परखा जाता है कि क्या प्रार्थी की ड्राइविंग दूसरों के लिए जानलेवा तो नही होगी, क्या वो इसके लिए सक्षम है ।
इसी प्रकार बच्चे पैदा करने का लाइसेंस तभी दिया जाना चाहिए जब ये तय हो जाये कि प्रार्थी ये जिम्मेदारी उठाने में सक्षम है । जब हर  जिम्मेदारी की योग्यता तय है तो इसकी क्यों नही । आखिर  बच्चे पैदा करना भी तो एक बड़ी जिम्मेदारी है  |

कुछ लोग सोचते हैं ये प्राकृतिक अधिकार है । प्राकृतिक अधिकार तो नंगे रहना भी है । प्रकृति तो इन्सान को अपनी माँ के साथ सेक्स करने से भी नही रोकती ।

इस समाज को सुविधाजनक रूप से चलने के लिए नियम कानून बनाये जाते है ।
नियम कानून  social interest के लिए बनाये  जाते  हैं जिसमे individual interest की हानि होती  है । यदि किसी individual interest से social interest की क्षति होती होती है तो social interest को तवज्जो देते हुए ऐसे individual interest को निषेध किया जाता है । बच्चे पैदा करना एक individual interest है और इससे social interest की क्षति (special case में ) किस प्रकार होती  है कुछ उदाहरण :-

1.केला खाकर छिलका पडोसी के घर के सामने फेंकना। ये हमारे संस्कार हैं और असुविधा पडोसी को और सभी राहगीरों को |

2. मार्किट में अतिक्रमण से बचते हुए, रोड पर चलते हुए, किसी गाड़ी से दुर्घटना होने पर सजा -गाड़ी वाले को और राहगीर को । और गलती-  अतिक्रमण करने वाले के पेरेंट्स की जो अपने बच्चों को इस लायक नही बना सके कि वो लीगल रूप से काम करके अपना पेट ही पाल सके | कारण– पेरंट्स खुद ही इतने सक्षम नही थे | तो फिर वही बात जब सक्षम नही  थे तो बच्चे क्यों पैदा किये ?.गलती किसी की सजा किसी को |

3.उन बच्चों का क्या दोष है जो इतनी ठण्ड में नंगे बदन रेलवे स्टेशन पर सोते है | क्या ये जीवन उनके लिए सजा नही है? ये सजा किसने दी ?

4.ये धरती सिर्फ इंसानों की नहीं है । सभी जीवों का इसपर बराबर हक़ है । आवारा जानवरों के चरने के लिए जो समलात भूमि निर्धारित है उस पर भी इंसानों ने अतिक्रमण कर रखा है । उन बेजुबान पशुवों का क्या दोष जो अपनी भूख मिटने के लिए  किसी खेत में घुस जाते है और खेत का मालिक उनकी गांड में मिर्ची दाल देता है |


उदारहण बहुत हैं जिसमे इन्सान की वक्तिगत मज़बूरी, रूचि, अक्षमता, अज्ञानता दूसरों  के लिए जानलेवा साबित होती  है  |
मज़बूरी का कारण है अपना वंश चलने की परंपरा | दूसरों का वंश जाये भाड़ में  |

Thursday, 3 January 2013

हमें औरतों के ऊपर कूदने के सिवाय कुछ नही आता


हमारे आचरण में पेरेंट्स के दिए गए संस्कार झलकते हैं। संस्कार सोच में बदलते हैं, सोच एक्शन में और हमारे एक्शन ही हमारा भविष्य और चरित्र निर्धारित करते हैं ।
इस नजरिये से देखा जाये तो बलात्कारियों से ज्यादा दोषी उनके पेरेंट्स हैं जिन्होंने अपने बच्चों को संस्कार नही दिए । ज्यादातर बच्चें ऐसे पलते हैं जैसे गली के आवारा कुत्ते पल जाते है । जो इन्सान अपने बच्चों की सही परवरिश नही कर सकता वो बच्चें पैदा क्यों करता है । ये शोध का विषय है ।

पिछले एक पखवाड़े से पूरा देश एक जज और अदालत की भूमिका में है । संस्कार देने की भूमिका कोई नही निभाता । टीवी देखते हुए, चाय की चुस्कियां लेते हुए, फंसी दे दो, नपुंसक बना दो आदि चिल्लाते हुए, क्या किसी पेरेंट्स ने अपने लड़के को पास बुलाकर ये बताने की जहमत उठाई की ये गलत है और क्यों गलत है । क्या हमारे पेरेंट्स ने हमें महिलायों/लड़कियों की इज्जत करना सिखाया है । बच्चों को इन्सान की तरह नहीं हथियार की तरह पाला जाता है। ये बच्चे बड़े होकर एटम बम बन जाते है और जब ये बम फूटते है तो निर्दोष लोगों को इसकी सजा भुगतनी पड़ती हैं । और हमारा कानून हथियार को बनाने वालों की बजाय हथियार को सजा देता है । बोल मूवी का एक डायलाग  है -अगर किसी की जान लेना गुनाह है तो बच्चे पैदा करना भी गुनाह हो सकता है । जो इन्सान अपने बच्चों की सही परवरिश नही कर सकता, वो बच्चे पैदा करके गुनाह करता हैं । इसलिए सजा बच्चों के साथ-साथ उनके पेरेंट्स को भी मिलनी चाहिए । नर्वे देश में ऐसा कानून है । यदि नर्वे का कानून हमारे देश में लागु करें तो लगभग पूरा देश क्रिमिनल बन जायेगा । हम सब क्रिमिनल हैं और हम सबने इसमें अपना अपना योगदान दिया है ।

मर्दों को औरतों के ऊपर कूदने के सिवाय और औरतों को टांग उठाने के सिवाय कुछ नही आता । और इस इंटरकोर्स में जो बच्चें पैदा होते हैं वो बच्चें नहीं, हादसे होते हैं और जब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, दिल्ली जैसे हादसे भी होते रहेंगे ।

Monday, 31 December 2012

मदिरों की भीड़ और पुस्तकालयों का सूनापन


आजकल सभी लेखकों के पास लिखने के लिए एक ही बात है " हमें खुद में बदलाव करना चाहिए और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की जानी चाहिए" ।

खुद में बदलाव होता है नजरिया बदलने से और नजरिया बदलता है अच्छे विचारों से और अच्छे विचार किताबों में कैद है ।

नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए पढने की आदत विकसित की जानी चाहिए । और सभी मंदिरों को पुस्तकालयों में बदल देना चाहिए ।

और सभी देवताओं को, g##nd  में राकेट और मिशाइलें डालकर अंतरिक्ष में दाग देना चाहिए   । मिशाइलों का भी सदुपयोग हो जायेगा और मंदिरों का भी ।

मदिरों की भीड़ और पुस्तकालयों का सूनापन ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है ।

Friday, 28 December 2012

एक लड़की के सबसे बड़े दुश्मन उसके पेरेंट्स होते हैं...



कल्पना चावला की उड़ान चाँद के पार पहुंची । क्या ये पुरुष प्रधान समाज उसकी उड़ान को रोक सका ? नहीं ।
क्योंकि चावला के पेरेंट्स ने उसको सपोर्ट किया और उसके पंख नही काटे । इसका मतलब ये है की यदि लड़की और उसके माता-पिता चाहे कि उनकी लड़की आगे बढे तो किसी समाज में इतना दम नही है कि वो एक लड़की को आगे बढ़ने से रोक सके ।

तो फिर लड़कियों के पिछड़ेपन के लिए दोष पुरे समाज को क्यों ? समाज का तो काम ही टांग खींचना है फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की। आखिर अपने बच्चों की सही परवरिश और उनको आगे बढाने की जिम्मेवारी पेरेंट्स की ही तो है ।
परन्तु इसके विपरीत लड़कियों के पांवों में बेड़ियाँ डालने वाले पहले शख्स लड़की के पेरेंट्स ही होते हैं, और इसके लिए उनके पास सिर्फ एक ही तर्क होता है - लोग क्या कहेंगे ???

अगर कल्पना के पेरेंट्स ने सोचा होता कि स्पेस यान में सिर्फ मलंग ही मलंग(पुरुष) हैं और हमारी लड़की अकेली इतने मलंगों के साथ चाँद पर जाएगी तो लोग क्या कहेंगे???, तो कल्पना चावला भी आज 80% पतिव्रता भारतीय नारियों की तरह गोबर के उपले और बितोड़े बना रही होती ।

एक लड़की के सबसे बड़े दुश्मन उसके पेरेंट्स होते हैं क्योंकि यही वो लोग हैं जो उसको कैद करके रखते हैं । और इस कैद से बाहर आने का रास्ता शोएब मंसूर की मूवी "बोल" में कैद है ।


Saturday, 8 December 2012

India is great! Really...

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है क्योंकि लोगों का तंत्र जब चाहे किताब, फिल्म और यहाँ तक कि हर अप्रिय लगने वाली सच्चाई को बैन कर सकता है |
भारत पूरी धरती को परिवार समझता है क्योंकि यहाँ जाती, धर्म, गोत्र की दीवारें सबसे ऊँची है और इन दीवारों को फांदने कि सजा यहाँ के संसकृति के ठेकेदारों के संविधान के अनुसार मोत है | यहाँ की सांसकृतिक विरासत बहुत विशाल है क्योंकि इसे पाश्चात्य संस्कृति से डर लगता है कहीं वो इस विरासत का पोस्टमार्टम न कर दे | इस अध्यात्मिक और धार्मिक देश में संस्कृतियों के बीच भी युद्ध होते है | गोयाकि संस्कृतियाँ हमलावर होती है(हालाँकि संस्कृतियाँ हमलावर नहीं तरल होती है, जो एक दुसरे में मिल जाती हैं और मिलकर और भी समृद्ध हो जाती है) | भारतीय संस्कृति को इन हमलों से हारने का भय है क्योंकि इसकी संस्कृति की जड़े बहुत गहरी हैं |
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है क्योंकि यहाँ सबसे ज्यादा हिंसा धर्म के नाम पर ही हुई है(हालाँकि हर धर्म का उद्देश्य शान्ति कायम करना है)| 
ये सब बातें फ़िल्मी लगती है और फिल्मे वास्तविक लगती है | बॉलीवुड को छोड़कर पूरा भारत ही एक फिल्म लगता है |

Sunday, 17 July 2011

A Letter From God to Bloody Indian

मैं भगवान हूँ !
भारतियों से परेशान हूँ !!
साले खुद कुछ कर नहीं सकते मेरी गांड में डंडा रखते हैं मेरा ये काम कर दो मेरा वो काम कर दो|
रिश्वतखोर मुझे भी रिश्वत देकर (प्रसाद, दान आदि) पटाना चाहते हैं|

बहरहाल मैं कोई ऐसी सुपर पावर नहीं हूँ की तुम 10  रूपये का प्रसाद मंदिर में चढाओगे और मैं तुम्हारे सभी काम कर दूंगा|

न तो तुम्हारा प्रसाद मेरे पास पहुंचता है और न ही दान किये हुआ पैसे |
मेरे पास पहुँचती है तुम्हारी नियत जो की इतनी सड़ी हुई है कि दुनिया भर का सेंट भी इसकी सड़ांध को कम नही कर सकता |

इन्सान खुद भी जाती, धर्म, स्थान की सीमायों में बंटा हुआ है और और मुझे भी मंदिर मस्जिदों में बंद कर दिया | और फिर कहता है ये तेरा भगवान ये मेरा भगवान | मेरा भगवान ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा निराकार; तेरा भगवान कुछ भी नहीं | हमारा भी competition करा दिया |

फिर भी कुछ लोगों की नियत अच्छी है |जैसे म.फ. हुसैन जिसने मेरी नंगी पेंटिंग्स बनायीं थी जो मुझे बहुत पसंद आई क्योंकि मैं हमेशा नंगा ही रहता हूँ | कपड़ों का अविष्कार इन्सान ने किया है और मैं इन्सान द्वारा बनाये कपड़ों का मोहताज नहीं हूँ | कपड़ें न पहनना इन्सान के लिए अनैतिक हो सकता है मेरे लिए नहीं | पर इन्सान भी कितना दबंग है मुझ पर भी अपनी नैतिकता थोंपना चाहता है|

इन्सान अपने आप में एक बहुत बड़ा अजूबा है और वह अजूबों की खोज में पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता है | ठीक वैसे ही जैसे मेरी खोज में |

कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोग कहते है मैं इस जग के कण-कण में विद्यमान हूँ | यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी टट्टी में भी हूँ फिर तुम अपनी टट्टी की पूजा क्यों नहीं करते ? सब की अपनी-अपनी अटकलें है|

खेर अभी चलता हूँ | 121 करोड़ अप्लिकेसन मेरी गांड में 121 डंडों की तरह लटक रही हैं | इन डंडों को निकालते-निकालते परेशान हो गया हूँ |

सभी भारतियों से निवेदन है अपने 3 पौंड के दिमाग का मोलिक उपयोग कीजिये, एन्जॉय कीजिये और मुझे भी करने दीजिये !!!
- God

Wednesday, 1 June 2011

ताजमहल से बड़ा अजूबा


idea के विज्ञापन में अभिषेक कहता है- मेरी बीवी स्टील इन मुठ्ठी |
ad इस बात का प्रचार करती है कि बीवी एक एक उपभोग कि वस्तु है जिसे मुठ्ठी में ही रखना चाहिए | ताकि कोई गैर मर्द इसका उपभोग करके न चला जाये |
आदित्य बिरला के पास दौलत, सोहरत , पॉवर सबकुछ है,फिर भी ये लोग पैसे के लिए इतना गिर सकते हैं तो एक गरीब निहत्थे आम आदमी से नैतिक बनने की उम्मीद कैसे कि जा सकती है?
दरअसल  लगभग सभी प्रसिद्ध लोग अनैतिक काम करके पैसा कमाते हैं,सफल हो जाते है. और फिर यही लोग किताबों में आदर्श की तरह पढाए जाते हैं. पैसे के ढेर पर बैठकर ये लोग हमें कहते हैं पैसा सबकुछ नहीं है, आप आदर्श बनिए | फिर भी कुछ लोग दुनिया भर के कष्टों को सहकर भी  नैतिक बने रहते है| यही भारत की महानता है और ताजमहल से बड़ा अजूबा भी | हम इन साधारण लोगों की पीड़ा को उन गहरे अर्थो में नहीं समझ पाते जिन अर्थों में ये असाधारण हो जाते है |

दरअसल अनैतिकता कोई अपराध नहीं है | हम किसी को नैतिक बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते और करना भी नहीं चाहिए | पर यदि आपको लगता है कि आपकी माँ एक उपभोग की वस्तु नहीं है तो आप निचे दिए गए नंबर पर जवाब मांग सकते है और अपनी शिकायत लिखवा सकते है |

Idea Nodal Officer, N Sagar- 9990555555
संतुष्टजनक जवाब न मिलाने पर अपना नंबर पोर्ट करावा सकते है- sms PORT to 1901(toll free)


Monday, 9 May 2011

धन का अध्यात्मिक पहलू

हर इन्सान भीतर से संजीदा होता है. पर भांति-भांति के मुखोटे लगाये बिना ज़िन्दगी की गाडी चलती नहीं. परन्तु जब आप सफल और आर्थिक रूप से सम्पन होते हैं तब पैसा आपको जस का तस उजागर होने की स्वतंत्रता देता है. इस दृष्टि से देखें तो धन के भी अध्यात्मिन पहलू हो सकते हैं. पर कलमाड़ी जैसे उन लोगों का क्या जिनकी संजीदगी तेल लेने गई है.
आम आदमी की दुविधा को समझा जा सकता है, लेकिन सबकुछ होने के बाद भी बेईमान बने रहना समझ से परे है.

Wednesday, 13 April 2011

साधारण असाधारण

अक्सर ऐसा होता है कि हम साधारण लोगों की पीड़ा को उन गहरे अर्थों  में नहीं समझ पाते
 जिन अर्थों में वो असाधारण हो जाते हैं.

दिल के और करीब
जिंदगी के और पास



Sunday, 10 April 2011

सेक्स का शरीर से क्या रिश्ता?

सदियों से हम ये भरम पाले बैठें हैं कि सेक्स शरीर में है, नदियों जैसे बहाव में है.
दरअसल ऐसा नहीं है. सेक्स हमारे दिमाग में है.
कई बार पलकों के उठने-गिरने से वो बात पैदा होती है जो पुरे कपड़े उतारने पर भी नहीं होती.
ये पूरा मामला दिमाग, फंतासी और कल्पना का है.

Wednesday, 23 March 2011

हर मुस्कराहट चैक की तरह होती है, जवानी उम्र की बसंत बहार होती है, चतुर लकड़ियाँ उम्र की मेहरबानियों को भविष्य निधि में बदलना जानती हैं और ऐसी साधवानी नहीं बरतने पर एक वक़्त आता है जब उम्र के बैंक में जावानी का खाता कमजोर होने लगता है, मुस्कराहटों के चैक बाउंस होने लगते और जिंदगी धारा 138 का केस बनकर अदालत जा पहुंचती हैं.